{"title":"New Releases","description":"","products":[{"product_id":"tamanna-khanam","title":"Tamanna Khanam","description":"\u003cp\u003eसंग्रह की कहानियों के लेखक हबीब कैफ़ी के आत्मकथ्य के संदर्भ में बरबस ही उर्दू के विश्व प्रसिद्ध अफ़साना निगार सआदत हसन मंटो की याद हो आती है तो इसलिए कि घोर गरीबी और अभावों के बीच भी उन्होंने जिस्म और नैसर्गिक यौन मनोविज्ञान को लेकर बेबाक लेखन किया था और इसके लिए उन्होंने मुकदमे भी झेले थे। लेकिन संग्रह 'तमन्ना खानम' की इन कहानियों के लेखक का संकोच व्यर्थ प्रतीत होता है। कारण इसका यह है कि लेखक ने लगभग इन्हीं विषयों को अपने मौलिक अंदाज में प्रस्तुत किया है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसिद्धहस्त कहानीकार हबीब कैफ़ी एक शायर भी हैं, अतः सांकेतिकता के गुण ने इन कहानियों को अर्थवत्ता प्रदान करने के साथ ही साथ जीवंत भी बना दिया है। काल के हिसाब से देखा जाए तो साढ़े पाँच दशक पहले से लेकर आज तक के समय की ये कहानियाँ ताजा ही लगती हैं। इन्हें पढ़ने वाले पाएँगे कि इस बीच सामाजिक सरोकार की बातें भी लेखक बड़ी सफाई और सहजता से कह जाते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअपनी अनूठी शैली, प्रवाहमय भाषा और सहज प्रस्तुति के कारण ये कहानियाँ बार- बार पढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। लंबे समय से जीवित ये कहानियाँ आगे भी बहुत लंबे समय तक जीवित रहती प्रतीत होती हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"habib Kaifi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42568447852659,"sku":"","price":299.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/TamannaKhanamCoverFront_2.jpg?v=1732078535"},{"product_id":"kala-dhaula-aur-rangeen-1","title":"Kala Dhaula Aur Rangeen","description":"\u003cp\u003eलिखित क्रिस्सागोई का बुनियादी गुण पठनीयता हुआ करता है, जो इस उपन्यास में पहले ही पृष्ठ से मौजूद है। यही कारण है कि उत्सुकता और जिज्ञासा को निरंतर बढ़ाता हुआ यह अंत तक बाँधे रखता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसंपन्नतम राजघराने की इकलौती राजकुमारी और उपन्यास की नायिका फ़िल्म अभिनेत्री पलक स्वयं में एक पूरी दुनिया समेटे हुए है। कभी किसी एक के आगे भी नहीं खुलने वाली यही पलक जब अपने एक श्रोता लेखक के आगे खुलने पर आती है तो इतना कुछ खोल कर रख देती है कि देख कर सुखद आश्चर्य होता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eज्ञानी होने का दावा यह अभिनेत्री कभी नहीं करती। फिर भी साहित्य-कला-संगीत और मानव मनोविज्ञान की उसकी समझ का हर कोई क्रायल हो जाता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रसंगवश ग़ालिब, वान गॉग, मंटो के साथ ही मेहबूब खान, के. आसिफ, गुरुदत्त, पृथ्वीराज कपूर, दिलीपकुमार, भगवान दादा, मास्टर निसार, नौशाद, शकील, साहिर, रफी और सलीम-जावेद वगैरह के तरिकरे प्रभावी, स्वाभाविक और रोचक हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअलग से न दिखाने के बावजूद पलक की खूबसूरती और उसके किरदार की बुलंदी भीनी-भीनी महक की तरह महसूस होती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eऐसे ही अन्य अनेक गुणों से संपन्न यह उपन्यास 'काला धौला और रंगीन' पठनीय और संग्रहणीय होने का अपने आप में प्रमाण है।\u003c\/p\u003e","brand":"habib Kaifi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42568493891699,"sku":"","price":299.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/KalaDholaRangeenCoverFront_1.jpg?v=1732079551"},{"product_id":"janadesh-2024","title":"Janadesh 2024","description":"\u003cp\u003eनाजिम नाकवी पत्रकारिता, लेखन और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में चार दशकों का समृद्ध अनुभव रखने वाले एक बहुआयामी और कुशल व्यक्तित्व हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत इलाहावाद के प्रतिष्ठित अखबार 'इलाहाबाद केसरी' और 'दैनिक प्रयागराज टाइम्स' से की। इसके चाद ऊँचाहार जिला रायबरेली से 'ऊँचाहार मेल' नामक सांध्य दैनिक के प्रकाशन और संपादन के जरिए, क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक सशक्त आवास के रूप में स्थापित हुए। दिल्ली आने के बाद, उन्होंने 'जनसत्ता' और 'नवभारत टाइम्स' जैसे राष्ट्रीय दैनिकों में स्वतंत्र लेखन किया और फिर टीवी पत्रकारिता में कदम रखा। 'सिने-इंडिया' के साथ टीवी की दुनिया में प्रवेश करते हुए उन्होंने कश्मीर की परिस्थितियों पर आधारित 'अपनी वादी अपने लोग' नामक एक सराहनीय डाक्यूमेंट्री का निर्माण किया। इसके बाद, 'देव-फीचर्स' के माध्यम से खेल पत्रकारिता में योगदान दिया और 'बोएजी फिल्म्स' में चौर क्रिएटिव डायरेक्टर अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया। उन्होंने उत्तर-पूर्वी भारत की जनजातियों और भारतीय शास्त्रीय संगीत पर केंद्रित कई महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट्री श्रृंखलाओं का निर्देशन किया, जिनमें उस्ताद विलायत खान साहब के साथ की गई संगीत-श्रृंखला भी शामिल है। टीवी जगत में नाजिम नक़वी की कार्यशैली ने उन्हें आजतक' में एग्जीक्यूटिव प्रोडयूसर और 'सहारा समय' में सीनियर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर की भूमिका तक पहुँचाया। 2014 के आम चुनावों के दौरान, 'इंडिया टीवी' के लिए उन्होंने एक विशेष प्रोग्रामिंग श्रृंखला का निर्माण किया, जिसमें किसी न्यूज चैनल पर पहली बार 'लौट आए बापू' जैसी फिक्शन श्रृंखला दर्शकों के लिए निर्देशित की। यह श्रृंखला इस विचार पर आधारित थी कि अगर महात्मा गाँधी आज के दौर में लौटते, तो समाज और राजनीति के प्रति उनकी क्या सोच और प्रतिक्रिया होती। \u003c\/p\u003e","brand":"Nazim Naqvi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42649999540339,"sku":"","price":750.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/Janadesh2024CoverHB50sheets170gsmmattlamination_page-0001.jpg?v=1733979793"},{"product_id":"ye-mere-log","title":"Ye Mere Log","description":"\u003cp\u003eदेश और घर\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eहिन्दी मेरा देश है भोजपुरी मेरा घर घर से निकलता हूँ तो चला जाता हूँ देश में देश से छुट्टी मिलती है तो लौट आता हूँ घर इस आवाजाही में कई बार घर में चला आता है देश देश में कई बार छूट जाता है घर मैं दोनों को प्यार करता हूँ और देखिए न मेरी मुश्किल पिछले साठ बरसों से दोनों में दोनों को खोज रहा हूँ।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e गमछा और तौलिया\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eगमछा और तौलिया दोनों एक तार पर टैंगे सूख रहे थे साथ-साथ वे टँगे थे जैसे दो संस्कृतियाँ जैसे दो हाथ-बायाँ और दायाँ झूलते हुए अगल-बगल तेज धूप में थोड़ी-सी गरमा-गरमी के बाद मैंने सुना- तौलिया गमछे से कह रहा था तू हिन्दी में सूख रहा है सूख, मैं अंग्रेजी में कुछ देर झपकी लेता हूँ।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Kameshwar Prasad Singh","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42650019463283,"sku":"","price":450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/YeMereLogCover100sheets170gsmmattlamination_page-0001.jpg?v=1733980036"},{"product_id":"the-yoga-sutras-of-patanjali","title":"The Yoga Sutras of Patanjali","description":"\u003cp\u003eYoga is a practice is that is ancient in its very nature. We do not know how old the yoga is but the earliest records can be found in the Form of Pashupati Seal which is estimated to be five thousand years old. The deity on the seal can be seen doing the Mulbandhaasana which is an advance Yoga posture. This claims the question how old Yoga is. The timeless treasure of human history, Yoga in Sanskrit means to join or to combine. To know that the witness the seer is one watcher; or Purusha, is the key to enlightenment. Yoga is a philosophy of discrimination between consciousness and that which is matter. To see them in unison is to witness the realm of the phenomenal world and to see them as sperate is to see the transcendental beyond.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eDiscover the timeless wisdom of the Yoga Sütras of Patanjali-one of the most revered and influential texts in the history of yoga and spiritual philosophy. In this masterful translation, Patanjali's profound teachings are brought to life alongside Bhojamärtanda, the insightful commentary by King Bhoja, an 11th-century philosopher-king. In this edition, readers are guided through each sútra with the clarity and depth of King Bhoja's interpretations, offering valuable perspectives that illuminate the path to self-realization and inner tranquility. King Bhoja's commentary bridges the ancient wisdom with practical insights, making this text a valuable resource for both beginners and experienced practitioners of yoga.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThe Yoga Sütras encapsulate a complete system of ethical living, mental discipline, and spiritual growth. Paired with King Bhoja's illuminating reflections, this edition serves as a comprehensive guide to mastering the mind, achieving inner peace, and embracing the true essence of yoga. Whether you are a dedicated student of yoga, a seeker of spiritual knowledge, or a lover of ancient texts, this book invites you on a transformative journey into the heart of yogic philosophy.\u003c\/p\u003e","brand":"Shivendra Vikram Singh","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42665394471027,"sku":"","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/TheYogaSutrasofPatanjalisheet_page002.jpg?v=1734414936"},{"product_id":"maestro-a-tribute-to-shyam-benegal-at-90","title":"Maestro: A Tribute to Shyam Benegal at 90","description":"\u003cp\u003eAs ace film director Shyam Benegal celebrates his 90th birthday on 14th December 2024, I found myself pondering the perfect gift for such an iconic figure. The idea of creating a personal tribute took shape, culminating in this book, Maestro. This is neither a scholarly analysis of Benegal's groundbreaking contributions to Indian cinema nor a conventional biography-those already exist. Instead, this isa heartfelt homage from a fan, associate and mentee, offering reflections on the master filmmaker's impact. The book includes some of my earlier writings on Mr. Benegal, alongside my reflections, thoughts and reminiscences. Its uniqueness lies in the inclusion of film reviews penned by my late friend, Vivek Chatterjee from Lucknow. These reviews, originally written for newspapers, vividly narrate the plots and stories of Benegal's films. They allow readers who may not have seen the films to visualize them through the mind's eye. With this blend of personal insights and detailed reviews, Maestro hopes to celebrate Benegal's brilliance from an intimate and heartfelt lens.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e~ Atul Tiwari\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"Atul Tiwari","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42687498911859,"sku":"","price":3499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/FrontCover.jpg?v=1753095291"},{"product_id":"the-black-book-of-arabia","title":"The Black Book of Arabia","description":"\u003cp\u003e\"For the average Western reader, diving into Hend Al Qassemi's debut novel 'The Black Book of Arabia' is an eye-opener. Couched in a series of short stories, Al Qassemi 's book gives a bird's-eye snapshot of Middle Eastern culture in several countries.\"\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e-Autumn Markus, NY Journal of Books\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"The stories leap across social class, strata and gender, zeroing on private tales of love, betrayal and heroism from across the Gulf.\"\u003cbr\u003e-Rob Garrett, The National\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"...engaging\" -Lilly Cox, The Lady\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"With \"The Black Book of Arabia', Sheikha Hend does not only showcase her first debut book, she masterfully displays an uncanny ability for storytelling.\"\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e-Bazaar Magazine\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"...a thoughtfully curated medley of true stories from across the Arabian Gulf that is candid, witty and refreshingly real.\"\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e-Elan Magazine\u003c\/p\u003e","brand":"Sheikha Hend Faisal Al Qassemi","offers":[{"title":"Default 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Title","offer_id":42693545590899,"sku":"","price":299.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/PipleFront.jpg?v=1735190155"},{"product_id":"pados-ka-samay","title":"Pados Ka Samay","description":"\u003cp\u003e'पड़ोस का समय 'शीर्षक इस संकलन में तीन खण्ड हैं. पहले खण्ड में साहित्य, कला और संस्कृति विषयक मुद्दों पर रोशनी डाली गई है. दूसरा खण्ड मीडिया पर और तीसरा खण्ड शिक्षा पर केंद्रित है. डॉ. अग्रवाल क्योंकि लम्बे समय से एक अध्येता और शिक्षक के रूप में साहित्य कर्म से जुड़े हैं और नियमित रूप से लिखते और प्रकाशित भी होते रहे हैं, साहित्य, कला और संस्कृति में उनकी रुचि और इनकी बारीकियों के बारे में उनकी समझ असंदिग्ध है. इस खण्ड के लेखों में वे इस दुनिया के अंतरंग से हमारा साक्षात्कार कराते हैं और यहाँ हो रही किसम-किसम की हलचलों का हवाला देते हुए उनके नेपथ्य तक हमें ले जाते हैं और यह भी बताते हैं कि उन तमाम हलचलों से हम और ये विधाएँ किस तरह प्रभावित हो रही हैं. यहाँ डॉ. अग्रवाल केवल अंधेरे-उजाले की बात करके ही नहीं थम जाते हैं, वे भविष्य और बेहतरी के लिए सुझाव भी देते हैं. इसी तरह मीडिया वाले खण्ड में वे बहुत तेजी से बदले और विकृत हुए मीडिया परिदृश्य की बहुत सारी अनदेखी-अनजानी परतों को उधेड़ते हैं और इन पर तीखी टिप्पणियाँ करके इसके दुष्प्रभावों से हमें आगाह करते हैं. किताब का तीसरा खण्ड शिक्षा से संबद्ध है. डॉ. अग्रवाल लगभग साढ़े तीन दशक राजस्थान की उच्च शिक्षा सेवा से संबद्ध रहे हैं और एक शिक्षक और शैक्षिक प्रशासक की अपनी विभिन्न भूमिकाओं में उन्होंने इस तंत्र को भीतर से देखा है. अपने इसी देखे के आधार पर और इस कर्म के प्रति अपने बहुत गहरे लगाव के कारण इन लेखों में वे देश और खासतौर पर राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर अपनी व्यथा हमसे साझा करते हुए इसकी बेहतरी के लिए सुझाव देते हैं.डॉ. अग्रवाल की पृष्ठभूमि साहित्य की है इसलिए स्वभावतः इन लेखों में उनका साहित्यानुराग और संस्कार स्पष्ट चीन्हे जा सकते हैं. यहाँ विषय भले ही चाहे जो हो, ये लेख किसी साहित्यक रचना का-सा स्वाद देते हैं. डॉ. अग्रवाल की भाषा का प्रवाह पाठक को अपने साथ बहा ले जाता है. डॉ. अग्रवाल के इन लेखों में एक बात और ध्यान देने योग्य है. वे किसी की आलोचना करते हुए भी कटु नहीं होते हैं और जिससे वे असहमत होते हैं उसके प्रति भी कोई अवमानना उनके यहाँ ढूंढे से भी नहीं मिलेगी. आज के कड़वाहट भरे समय में यह बात खास तौर पर सराहनीय है.\u003c\/p\u003e","brand":"Durgaprasad Agrawal","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42840415895667,"sku":"","price":750.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/PadoskaSamayFront_1.jpg?v=1739170145"},{"product_id":"gam-e-rozgar-mein-jaisalmer","title":"Gam-e-Rozgar Mein Jaisalmer","description":"\u003cp\u003eजैसलमेर अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर के साथ-साथ विकट भौगोलिक स्थितियों के लिए भी जाना जाता है। देश के पश्चिमी इलाके का सीमांत क्षेत्र होने की वजह से वहां के जन-जीवन को और अधिक मुश्किलों का सामना करना है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के उपरांत भी जैसलमेर जीवटता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक सन्दर्भों में देखें तो मध्य-एशिया के देशों से व्यापार का सुरक्षित मार्ग रहा है। सिंध से लगा होने के कारण सिन्धुत्व का असर वहां की संस्कृति पर है। लोक कलाओं का समृद्ध भण्डार थार से निकल कर विश्व भर में ख्याति अर्जित कर रहा है। भले सैलानियों को सम के धोरे आकर्षित करते हों पर संस्कृति के अन्य पहलू भी कम नहीं हैं। जैसलमेर पर यात्रा वृतांत और पर्यटक की नज्जर से बहुत लिखा गया है लेकिन इस पुस्तक में वहां की विषमताओं का सटीक अध्ययन, संस्कृति, इतिहास, कला और जीवन को समग्रता में समेटने का प्रयास किया गया है। ऐसा करते हुए लेखक ने डायरी शैली की सीमाओं का अतिक्रमण किया है। भाषायी मुहावरा बहुत सरल और सहज संप्रेषित होने वाला है। पर्यटन ही नहीं फ़िल्मी दुनिया के लोगों को भी यह धरती आकर्षित करती रही है। शूटिंग के प्रसंग, सामाजिक ताने-बाने और रियासत के ऐतिहासिक सन्दर्भों का जिक्र इसे अलग कलेवर प्रदान करता है। यह पुस्तक जैसलमेर ही नहीं वरन संस्कृति और संघर्ष के समन्वय की दास्ताँ कहती प्रतीत होती है जिससे देश-विदेश के पाठकों के लिए एक खिड़की खुलती है।\u003c\/p\u003e","brand":"Raghvendra Rawat","offers":[{"title":"Default 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के साथ-साथ उसके पिता भी मारे गए। गहरे सदमे में, सलमा मानती है कि उसके पिता के असली हत्यारे वे लोग हैं, जो पाकिस्तानी युवाओं को आतंकी बनने के लिए उकसाते हैं। वह उनसे बदला लेना चाहती है, लेकिन समझ नहीं पाती कि कैसे। हालात ऐसे बनते हैं कि आईएसआई उसे अपने जाल में फंसाकर लंदन में बम विस्फोट करवाने की योजना बनाता है। लेकिन सलमा एक मस्जिद में बम विस्फोट कर कुछ जिहादियों को मार देती है और आईएसआई की साजिशों को उजागर कर देती है। उसे जान से मारने की आईएसआई की कोशिश नाकाम रहती है, पर अब उसे पता है कि उसकी जिंदगी हमेशा खतरे में रहेगी।यह भी सवाल है कि आतंकी बनाने का धंधा कब तक चलेगा।\u003c\/p\u003e","brand":"Devendra Narain","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42840427069555,"sku":"","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/KabTakCoverfinalFront_1.jpg?v=1739170539"},{"product_id":"gaye-dinon-ka-surag-lekar","title":"Gaye Dinon Ka Surag Lekar","description":"\u003cp\u003e'गए दिनों का सुराग़ लेकर 'के ये संस्मरण पढ़ते हुए कभी ठहाका लगाएँगे, कभी उदास होंगे, कभी आपकी आँखें नम होंगी तो कभी आप विचारमग्न हो जाएँगे, कभी आप अपने जीवन का भी वैसा ही कोई प्रसंग याद करेंगे तो कभी जीवन की विचित्रता पर चकित होंगे. इन संस्मरणों की आप पर प्रतिक्रिया चाहे जैसी भी हो, एक बात निश्चित है और इसे आप हमारी चेतावनी भी मानें, कि एक बार इस किताब को हाथ में ले लेंगे तो इसे पूरी किए बगैर आप छोड़ नहीं पाएँगे.\u003c\/p\u003e","brand":"Durgaprasad Agrawal","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42840431198323,"sku":"","price":350.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/GayeDinonkaSuragLekarFront_1.jpg?v=1739170729"},{"product_id":"missing-links","title":"Missing Links","description":"\u003cp\u003eThe stories and events shared in this book are based on personal experiences and reflections. While they are meant to inspire thought and personal growth, the views expressed are the author's own and should not be considered professional advice. Any resemblance to actual people or events is purely coincidental. The reader is encouraged to interpret the content in a way that best fits their own understanding and beliefs. The author and publisher are not responsible for any actions taken based on the insights or interpretations from this book.\u003c\/p\u003e","brand":"Madan Mohan Neekhra","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42898405130355,"sku":"","price":350.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/MissinglinksCover.jpg?v=1741411001"},{"product_id":"unki-kahaniyan-mere-natak","title":"Unki Kahaniyan Mere Natak","description":"\u003cp\u003eप्रख्यात नाटककार, अभिनेता, निर्देशक एवं शिक्षाविद प्रोफ़ेसर नरेन्द्र नाथ पांडेव जी द्वारा रचित विश्व की कालजयी कहानियों का हिन्दी नाट्य रूपांतर, साहित्य जगत की बड़ी घटना है। अनेक दृष्टियों से यह पुस्तक न केवल उत्सुक पाठकों, बल्कि शोधार्थियों एवं समालोचकों, तथा रंगकर्मी एवं फ़िल्म-निर्माताओं के लिए भी आकर्षक व उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही, हिन्दी में विश्वस्तरीय नाटकों की कमी भी दूर हो पाएगी। बड़ी साधना, तन्मयता और विद्वत्ता के साथ प्रोफेसर पांडेय जी ने इस कठिन काम को सृजनात्मक ऊँचाई दी है। उनकी अमोघ दृष्टि और विवेक के दर्शन कहानियों के चयन से लेकर नाट्य रूपांतर, संवादों की स्वाभाविकता और कथानक के निर्वाह में द्रष्टव्य होते हैं। कई बार लगता है, कि ऐसी ही प्रतिभाएँ महान कथाओं को फ़िल्म में रूपांतरित करती हैं। जो काम दृश्य माध्यम सुगमता से कर सकता है, उसे केवल श्रव्य माध्यम, यानी रेडियो के ज़रिए करना कठिन ही नहीं, 'तरवार के धार पे धावन है'।\u003c\/p\u003e","brand":"Dr. Narendra Nath Pandey","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42902444277875,"sku":"","price":699.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/UnkiKahaniyanMereNatakFinalFront.jpg?v=1741680429"},{"product_id":"nariwad-ka-vikas-kram-ek-darshnik-vishleshan","title":"Nariwad Ka Vikas Kram: Ek Darshnik Vishleshan","description":"\u003cp\u003eनारीवादी विचारधारा के अंतर्गत सदियों से समाज में स्त्री-पुरुष समानता के प्रश्न उभरते रहे हैं। स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में सदैव द्वितीय स्थान ही प्राप्त रहा है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। किन्तु आज नारीवाद का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो चुका है। नारियों से जुड़ा होने के कारण यह वर्तमान समय में प्रासंगिक है। नारीवाद एक प्रयासरत सिद्धांत है जो हर स्तर पर असमानता का विरोध करता है। नारीवाद के विकास क्रम के दार्शनिक विश्लेषण को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य वर्तमान काल के नारीवाद की विशेषता एवं महत्ता को उजागर करना है। मैंने अपनी पुस्तक में नारी के बढ़ते कदम को दार्शनिक दृष्टिकोण से उजागर करने की कोशिश की है, जिससे वर्तमान नारी समाज, नारीवादी आंदोलनों से प्रेरणा लेकर अपने अधिकारों के प्रति सजग हो सके।\u003c\/p\u003e","brand":"Dr. Cindrella Anand","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":42981573394547,"sku":"","price":350.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/NarivadKaVikasKramFront.jpg?v=1744353923"},{"product_id":"raghavan","title":"Raghavan","description":"\u003cp\u003e\"राघवण\" हि प्रदूषणावरची कादंबरी आहे. राघवणच बालपण खेडेगावात गेलं. तिथला निसर्ग त्याला भुरळ घालतो. वयाच्या ६५ व्या वर्षीही त्याला त्याच बालपण साद घालत. खळाळून वाहणाऱ्या नद्या, नाले, हिरवीगार वनश्री, पाण्याने तुडुंब भरलेल्या विहिरी त्याला आठवतात. कादंबरीची सुरवात १९७० साली होते. इसवीसन २०२७ ला राघवण ६५ वर्षांचा होतो. तो आता गडगंज श्रीमंत आहे. त्याच स्वतःच विमान, हेलिकॉप्टर्स आहेत. तो शिवाचा निस्सीम भक्त आहे. त्याला पृथ्वीला परत तरुण करण्याचा ध्यास लागलाय. पृथ्वीवरच्या प्रदूषणाला मानवच कारणीभूत असल्याचं त्याच ठाम मत आहे. पृथ्वीच्या विद्रुपीकरणाला जगातली भयानक वाढलेली लोकसंख्या आहे असं त्याला वाटतंय. आपल्या दोन मित्रांना सोबतीला घेऊन जगातली लोकसंख्या करोडोवरून एक लाखावर आणण्याचा तो ध्यास घेतो. या साठी तो आकाशातल्या ओझोन थराता नष्ट करायचं ठरवतो. त्या साठी हॉट एअर बलून व त्यात फ्रेऑन वायू चे सिलेंडर्स आकाशात पाठवणार असतो. त्या साठी तो एक एनजिओ स्थापन करतो. जगात ठीक ठिकाणी भाषण देतो, हवेतल कार्बन डायऑक्साइडच वाढलेले प्रमाण, वितळणारे हिमनग, समुद्राची वाढती पातळी, वाढणार तापमान यावर जोर देतो. जगातून एक लाख सभासद गोळा करतो. सर्व गडगंज श्रीमंत. पुढे होऊ घातलेल्या उत्पादाचा त्रास त्याला व सभासदांना होऊ नये म्हणून नाशिक जवळचा अंजनेरी पर्वत मधून पोखरून जमिनीखाली भलं मोठं सर्व सुविधांनी युक्त शहरच बसवतो. मनूने प्रलयाच्या वेळी जसे सर्व प्रकारचे प्राणी, वनस्पती, बीबियाणे त्याच्या होडीत भरून घेतले होते तसे तो या जमिनीखालच्या शहरात गोळा करून ठेवतो. हे सर्व करताना यास शिवाचा आशीर्वाद आहे किंवा हे सर्व करण्याची शिवाने मला आज्ञा दिली आहे असं तो सर्वांना सांगतो. बरेचशे कायदे मोडतो, डावलतो. जसे फ्रेऑन ज्याला CFC गॅस पण म्हणतात, आंतरराष्ट्रीय बाजारात यावर बंदी आहे, हा गॅस जगातल्या काळ्या बाजारातून प्रचंड प्रमाणात गोळा करतो. अंजनेरी पर्वत पोखरून काढतो. या उद्योगात काही खून तो घडून आणतो.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eराघवण मधला \"घ\" निघुन जाऊन रावण केव्हा झाला हे राघवण च्या हि लक्ष्यात येत नाही.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसाहजिकच भारताची रॉ हि गुप्तचरसंघटना त्याच्या मागे लागते. \u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Jagdish Deore","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43011130687603,"sku":"","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/Raghavan_Marathi_CoverFront.jpg?v=1745386103"},{"product_id":"pride-prejudice","title":"Pride \u0026 Prejudice","description":"\u003cp\u003e\u003cspan class=\"a-text-bold a-text-italic\"\u003e‘But people themselves alter so much, that there is something new to be observed in them for ever.’\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e\u003cbr\u003e\u003cbr\u003eA sensitive story about the loves and lives of the five Bennet sisters, especially Elizabeth Bennet the unusual heroine. Elizabeth is neither too pretty nor too talented but has a strong sense of self; it was fireworks when she met Mr. Darcy who finally clashed with someone as strong-willed as him.\u003cbr\u003e\u003cbr\u003eMrs Bennet wants to marry her daughters off and devises schemes to set them up with prosperous men at the ball hosted by the Bingley family. All her daughters find love, but not the easiest route to marriage.\u003cbr\u003e\u003cbr\u003eTheir journeys take them through unexpected betrayals and surprises. As life pits Darcy and Elizabeth against each other, Darcy is the saviour at every turn squashing every reason for Elizabeth’s hesitence. Can Elizabeth overcome her pride to seek love?\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Jane Austen","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053339508851,"sku":"","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/PrideandPrejudiceCoverFront.jpg?v=1747120613"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij","title":"Aalochna Ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003eआलोचक और अकादमिक माधव हाड़ा की दिलचस्पी का क्षेत्र मध्यकालीन साहित्य और इतिहास है। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य, मीडिया और संस्कृति पर भी लिखा है। उनकी चर्चित कृति 'पचरंग चोला पहर सखी री' (2015) मध्ययुगीन संत-भक्त कवयित्री मीरांबाई के जीवन और समाज पर एकाग्र है, जिसका अंग्रेज्ती अनुवाद 'मीरां वर्सेज मीरां' 2020 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दो वर्षीय अध्येतावृत्ति के अंतर्गत (2019-2021) 'पदमिनी विषयक देशज ऐतिहासिक कथा-काव्य का विवेचनात्मक अध्ययन' विषय पर शोध कार्य किया, जो 'पद्मिनी: इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी' (2023) नाम से प्रकाशित हुआ है। हाल ही में उन्होंने 'कालजयी कवि और उनका काव्य' नामक एक पुस्तक श्रृंखला का संपादन किया है, जिसमें कबीर, रैदास, मीरां, तुलसीदास, अमीर खुसरो, सूरदास, बुल्लेशाह, गुरु नानक, जायसी, रहीम, सहजोबाई, लालन फ़क़ीर, ललद्यद, अक्क महादेवी, दादू दयाल, रसखान और नामदेव शामिल हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Madhav Hada","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053343899763,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/3MadhavHada-CoverFront.jpg?v=1747120862"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-1","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003e1965 में बंगाल की पैदाइश। आरम्भिक शिक्षा गाँव सुल्तानपुर और पोस्ट गौसपुर में। हाई स्कूल पास के कस्बे मुहम्मदाबाद से। इसके बाद स्नातकोत्तर तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस से। शोधकार्य जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से। अध्यापन उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा, असम विश्वविद्यालय, सिलचर और अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में। प्रकाशित पुस्तकें - छायावादयुगीन साहित्यिक वाद विवाद, हिंदी नवरत्न, चेखव, वर्तमान सदी में मार्क्सवाद, रूसी क्रांति और साहित्य संस्कृति, मार्क्सवाद का नवीकरण, संकट में संवाद, आजादी और लोकतंत्र तथा रंगभेद के चार सौ साल। सामाजिक विज्ञान की अनेक पुस्तकों के अनुवाद और कुछ पुस्तकों का सम्पादन भी। ढेर सारी पत्रिकाओं में लगातार लेख और समीक्षाओं का लेखन।\u003c\/p\u003e","brand":"Gopal Pradhan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053346521203,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/GopalPradhan-CoverFront.jpg?v=1747121031"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-2","title":"Aalochna Ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003e1953 में ब्रज-प्रदेश राजस्थान के भरतपुर जिले के हलैना नामक गाँव में जन्म। प्रारम्भिक माध्यमिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल में। उच्च शिक्षा भरतपुर एवं आगरा में। आगरा के प्रसिद्ध कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी हिन्दी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ से एम.ए. तथा पी-एच.डी.। राजस्थान के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन के बाद महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) में स्त्री अध्ययन विभाग में प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त । प्रकाशित पुस्तकें : मैंने पढ़ा समाज, कहानीः समकालीन चुनौतियाँ, दो अक्षर सौ ज्ञान, अनहद गरजै, साहित्य-सृजन बदलती प्रक्रिया, कहानीः वस्तु और अन्तर्वस्तु, कहानी की अन्दरूनी सतह, कहानी यथार्थवाद से मुक्ति, डिबिया में धूप।\u003c\/p\u003e","brand":"Shambu Gupt","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053351895155,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/2ShambuGupta-CoverFront.jpg?v=1747121169"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-3","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003eरोहिणी अग्रवाल हिंदी की सुपरिचित आलोचक, कवि एवं कहानीकार हैं जिनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से मानविकी संकाय के अधिष्ठाता और अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त प्रो अग्रवाल की प्रमुख पुस्तकें निम्न हैं - इतिवृत्त की संरचना और संरूप, समकालीन कथा साहित्य सरहदें और सरोकार, स्त्री लेखन स्वप्न और संकल्प, साहित्य की जमीन और स्त्री मन के उच्छ्वास, हिंदी कहानी: वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग, हिंदी उपन्यास का स्त्री पाठ, साहित्य का स्त्री स्वर, हिंदी उपन्यास समय से संवाद, कथालोचना के प्रतिमान और कहानी का स्त्री- समय। एक कविता संग्रह के साथ आपके दो कहानी संग्रह घने बरगद तले तथा आओ माँ हम परी हो जाएं भी प्रकाशित हुए हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा तीन बार सम्मानित प्रो अग्रवाल को स्पंदन आलोचना सम्मान, वनमाली कथा आलोचना सम्मान, रेवांत मुक्तिबोध सम्मान, डॉक्टर शिव कुमार मिश्र स्मृति सम्मान, डॉक्टर रामविलास शर्मा स्मृति सम्मान सहित अनेक सम्मान पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Rohini Agrawal","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053355630707,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/5RohiniAgrawal-CoverFront.jpg?v=1747121319"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-4","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003eहिन्दी के चर्चित आलोचक, कहानीकार और कवि। बिहार राज्य के अहिरौली, बक्सर में 1965 में जन्म। साहित्य के इतिहास, 1857, समाजशास्त्रीय अध्ययन और ग्रामीण इतिहास में गहरी दिलचस्पी। प्रकाशित किताबों में प्रमुख हैः पर जरूरी हैं कविता (काव्य-संग्रह), कुछ समय बाद (कहानी संग्रह), यह वह प्रदेश तो नहीं (सामूहिक संस्मरण), दस्तक एक और दो (सं., काव्य संकलन), आलोचना का जनतंत्र, समकालीन कहानी का समाजशास्त्र, आधुनिक भारत के इतिहास लेखन के कुछ साहित्यिक स्रोत, कथाकार अमृतलाल नागरः शहर की संस्कृति और इतिहास के कुछ सवाल, पंचकोशी मेल, रसखान, 1857: भारत का पहला मुक्ति संघर्ष, हाशिये का वृत्तान्तः स्त्री, दलित और आदिवासी समाज का वैकल्पिक इतिहास, विश्व साहित्यः चुनिंदा रचनाएं, हिन्दी साहित्य का इतिहासः कुछ पाठ, कुछ विचार (खंड 1), हिन्दी साहित्य का इतिहासः कुछ पाठ, कुछ विमर्श (खंड 1) आदि। एक लेखक के रूप में जापान, मॉरीशस, चीन, उज्बेकिस्तान, श्रीलंका आदि देशों की यात्राएं। सन 2000 में संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की लेखकों को दी जानेवाली राष्ट्रीय फेलोशिप प्राप्त। हिन्दी अध्यापन के लिए ताशकंद राज्य प्राच्य अध्ययन विश्वविद्यालय, उज्बेकिस्तान से सम्मानित। आजकल युवा लेखकों के साथ पाँच खंडों में हिन्दी साहित्य का इतिहास पर कार्य।\u003c\/p\u003e","brand":"Devendra Choubey","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43053358252147,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/4DevendraChobe-CoverFront.jpg?v=1747121468"},{"product_id":"rani-sahiba","title":"Rani Sahiba","description":"\u003cp\u003eरचना और रोशन की प्रेम कहानी के साथ यह उपन्यास धर्म निरपेक्ष, तरक़्क़ीपसंद और सक्रिय हिंदुस्तान की तस्वीर प्रस्तुत करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउपन्यासकार की दृष्टि अतीत पर नहीं, भविष्य पर है जो उनकी अपनी ताक़त है। हर लेखक अपनी तरह की दुनिया चाहता है, उसी को नये-नये रूपों में व्यक्त करता है। हबीब कैफ़ी 'रानी साहिबा' के माध्यम से भी वही करते हैं और यह करना जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही सशक्त यह उपन्यास है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eमहलों, रजवाड़ों और सामंतों की निजी ज़िन्दगी के ऐसे अनजाने चित्र इस उपन्यास में हैं, जो इतिहास से ओझल हो रहे हैं। उन्हीं भव्य इमारतों में रचना और रानी साहिबा की संवेदनशील दुनिया इस उपन्यास में बेहद मानवीय रूप से चित्रित हुई है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e'रानी साहिबा' से हबीब कैफ़ी ने एक और उपेक्षित लेकिन उर्वर ज़मीन तोड़ी है, जो उनकी विकासमान रचनात्मकता की गवाही है।\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"habib Kaifi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43067795832947,"sku":"","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/Rani_Sahiba_Cover_Front.jpg?v=1752563292"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-5","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003eदेवरिया (उत्तर प्रदेश) में जन्मे और जे एन यू, नई दिल्ली से उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रतिष्ठित कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के मानविकी विद्यापीठ में हिंदी के प्रोफेसर हैं। पूर्व में इग्नू के कुलसचिव और पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा प्रबंध विद्यापीठ के निदेशक रह चुके हैं। इन दिनों इग्नू के अंतरराष्ट्रीय प्रभाग के निदेशक हैं।\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Jitendra Shrivastava","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43067797864563,"sku":"","price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/Jitendra_Srivastava_-_Cover_Front.jpg?v=1752563346"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-a-series-of-10-books","title":"Aalochna ke Naye Kshitij - A Series of 10 Books","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e'आलोचना के नये क्षितिज' कौटिल्य बुक्स की महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला है जिसमें वर्तमान आलोचना में सार्थक हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ आलोचकों के कृतित्व का प्रतिनिधि लेखन है। किसी भी समय के साहित्य के लिए आलोचना की उपस्थिति सबसे आवश्यक है जो न केवल साहित्य के मूल्य निर्णय की जिम्मेदारी लेती है बल्कि अपने समय के साहित्यिकों के प्रदाय का स्थान भी निर्धारित करती है। पाठकों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए यह श्रृंखला उपयोगी सिद्ध होगी। सुपरिचित आलोचक और बनास जन के सम्पादक पल्लव ने इस श्रृंखला का सम्पादन किया है जो पूर्व में भी कौटिल्य बुक्स की एक गौरवमयी पुस्तक श्रृंखला 'मैं और मेरी कहानियाँ' का सम्पादन कर चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू महाविद्यालय में सह आचार्य डॉ पल्लव अपनी साहित्यिक सक्रियता और गहन अंतर्दृष्टि के कारण समादृत हुए हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Pallav","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186566692979,"sku":null,"price":3990.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/AlochnaCollage.jpg?v=1752214136"},{"product_id":"mansarovar-series-of-8-books","title":"Mansarovar - Series of 8 Books","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eमुंशी प्रेमचंद का नाम भारतीय साहित्य में एक ऐसी लौ की तरह है, जो न केवल अपनी रचनात्मकता से उजाला फैलाती है, बल्कि समाज के अंधकारमय कोनों को भी बेबाकी से उजागर करती है। जन्म से धनपत राय और साहित्य-जगत में 'प्रेमचंद' के नाम से प्रसिद्ध इस महान लेखक ने भारतीय समाज की परतों को जिस संवेदनशीलता, गहराई और सच्चाई से उकेरा, वह उन्हें अन्य लेखकों से अलग पहचान दिलाता है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक कालखंड में जब भारत गुलामी, गरीबी और सामाजिक कुरीतियों से जूझ रहा था, तब प्रेमचंद ने अपनी कलम को हथियार बनाया। वे केवल कहानियाँ नहीं लिखते थे- वे व्यवस्था से प्रश्न करते थे, अन्याय पर प्रहार करते थे, और उन लोगों को आवाज देते थे जिन्हें समाज ने मौन कर दिया था। चाहे वह जमींदारी शोषण हो या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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या स्त्री की पीड़ा, धार्मिक पाखंड हो या जातिवाद की विभाजनकारी सोच-प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं। उनकी भाषा सरल, सहज और आमजन की बोलचाल से निकली हुई होती है, जिससे पाठक तुरंत जुड़ाव महसूस करता है। गोदान, निर्मला, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम, गबन जैसे उपन्यास और कफन, ईदगाह, नमक का दरोगा, पूस की रात जैसी कहानियाँ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं, बल्कि भारतीय समाज का जीवंत दस्तावेज भी हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि बदलाव की शुरुआत संवेदना और समझ से होती है। वे लेखकों के लिए आदर्श हैं, पाठकों के लिए मार्गदर्शक, और समाज के लिए एक सच्चे चिंतक। उनका लेखन आज भी उन मूल्यों की याद दिलाता है जिन पर एक न्यायसंगत और समरस समाज की नींव रखी जा सकती है। यह पुस्तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य को नई पीढ़ी के सामने रखने का एक विनम्र प्रयास है- ताकि हम न केवल उनके शब्द पढ़ें, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात करें।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Munshi Premchand","offers":[{"title":"Default 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Revered as the foremost sanyasi of his time, he shaped the scholarly stature of the ashram and became a guiding light for sages across traditions. His extensive writings on the Prasthanatrayi- the Upanishads, Bhagavad Gita, and Brahmasutras-stand as pillars of Advaitic thought. His Tippanis (annotations) are considered foundational texts by serious students of Vedanta; his magisterial work on the Brihadaranyaka Upanishad remains unmatched. Yet his legacy goes beyond scriptural exegesis. He nurtured generations of disciples who established Vedantic centres across India of Sanatana Dharma. Born as Vishnu Das Hariyani in Talgajarda, Gujarat, his journey led from Vadodara to Kashi, and eventually to Rishikesh, where he took Sanyas. As Mahamandaleshwar, he travelled widely across the country and even into present-day Pakistan. Though relatively obscure today, he was extremely well-known in his time across the ascetic world. Swami Vishnudevananda Giri was a Himalayan spirit, a fully realized soul who walked among us with the dignity of one who had touched the eternal, and is eternal himself. This book is the result of an in-depth journey-blessed by Pujya Morari Bapu to every place he visited, tracing the milestones of his life, documenting first-hand accounts, and gathering rare archival material. It offers scholars and spiritual readers a panoramic view of his resplendent life and cosmic inner world-an enduring tribute to the rare silence, clarity, and spiritual radiance he embodied.\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Morari Bapu","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186634293363,"sku":null,"price":799.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/TheDivineSilenceofKailashFront_1.jpg?v=1752215600"},{"product_id":"swami-vishnudevananda-giri-saakshaatkaar","title":"Swami Vishnudevananda Giri || Saakshaatkaar ||","description":"\u003cp\u003eस्वामी विष्णुदेवानंद गिरि, ऋषिकेश स्थित कैलाश आश्रम के छठे पीठाधीश थे। यह संस्थान कभी आदि शंकराचार्य की वंशावली में अद्वैत वेदांत अध्ययन का सर्वोच्च केंद्र माना जाता था। अपने समय के सर्वोच्च संन्यासी के रूप में प्रतिष्ठित, उन्होंने आश्रम की विद्वत्तापूर्ण प्रतिष्ठा को आकार दिया और विभिन्न परंपराओं के संतों के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश बने। प्रस्थानत्रयी - उपनिषद, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र - पर उनके व्यापक लेखन अद्वैतवादी विचारधारा के स्तंभ हैं। उनकी टिप्पणियाँ (टिप्पणियाँ) वेदांत के गंभीर अध्येताओं द्वारा आधारभूत ग्रंथ मानी जाती हैं; बृहदारण्यक उपनिषद पर उनका उत्कृष्ट कार्य बेजोड़ है। फिर भी, उनकी विरासत शास्त्रीय व्याख्या से कहीं आगे तक जाती है। उन्होंने शिष्यों की कई पीढ़ियों का पालन-पोषण किया जिन्होंने पूरे भारत में सनातन धर्म के वेदांतिक केंद्र स्थापित किए। गुजरात के तलगाजर्दा में विष्णु दास हरियानी के रूप में जन्मे, उनकी यात्रा वडोदरा से काशी और अंततः ऋषिकेश तक हुई, जहाँ उन्होंने संन्यास लिया। महामंडलेश्वर के रूप में, उन्होंने पूरे देश में और यहाँ तक कि वर्तमान पाकिस्तान में भी व्यापक रूप से यात्रा की। हालाँकि आज वे अपेक्षाकृत गुमनाम हैं, फिर भी अपने समय में वे तपस्वी जगत में अत्यंत प्रसिद्ध थे। स्वामी विष्णुदेवानंद गिरि एक हिमालयी आत्मा थे, एक पूर्ण साक्षात्कारी आत्मा जो हमारे बीच उस गरिमा के साथ विराजमान थी जिसने शाश्वत को छू लिया था, और जो स्वयं शाश्वत है। यह पुस्तक पूज्य मोरारी बापू द्वारा आशीर्वादित एक गहन यात्रा का परिणाम है, जिसमें उन्होंने जिन-जिन स्थानों का भ्रमण किया, उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों का पता लगाया, प्रत्यक्ष वृत्तांतों का दस्तावेजीकरण किया और दुर्लभ अभिलेखीय सामग्री एकत्रित की। यह विद्वानों और आध्यात्मिक पाठकों को उनके तेजस्वी जीवन और ब्रह्मांडीय आंतरिक जगत का एक विस्तृत दृश्य प्रस्तुत करती है—उनके द्वारा धारण की गई दुर्लभ मौन, स्पष्टता और आध्यात्मिक तेज के प्रति एक चिरस्थायी श्रद्धांजलि।\u003c\/p\u003e","brand":"Morari Bapu","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186638815347,"sku":null,"price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/sakshatkarFront_1.jpg?v=1752215800"},{"product_id":"yagnopnishada","title":"Yagnopnishada","description":"\u003cp\u003eThe word Upanishad is made of three parts:\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eupa (उप) = near\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eni (नि) = down\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eşad (षद्) = to sit\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eSo, at its simplest: Upanishad is \"to sit down near (the teacher).\"\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eYagnopnishada, therefore, literally means to sit down near the Guru by the sacred fire, where the highest truths are discussed and the greatest knowledge is imparted in an intimate gathering.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThe evening discourses of Morari Bapu are not born from the grandeur of the Vyas Peeth where he addresses millions, but from the soft, flickering light of the yagna-kund, where he sits in the evening-a little withdrawn, a little more open. It is here, in these intimate baithaks, that something rare is revealed. Often in words, and also often enough through gestures.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eKatha has been Bapu's chosen path, his lifelong mode of expression. But it is not performance. It is prayer. It is not speech. It is swar. He has often said, \"I sing my Guru.\" And that is truly what his Katha is, a song to the one who opened his eyes to light. His words arise not from intellectual effort, but from anubhav, lived experience. He comes not to instruct, but to awaken.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThere have been thousands of Kathas, over 950 across more than six decades, and much has been written about what has been said from the Vyaspeetha: books, magazines, essays, and more.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eAnd yet, the paradox remains. While Bapu is the vessel through whom the greatest knowledge flows, Katha is mostly never about Bapu. He appears only in glimpses: a turn of grandfather, a story from childhood. It is like catching the phrase, a tremble in his voice, a small recollection about his scent of rain before it falls. You know he is there, but he has already moved on.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThe evening baithaks offer something else. They are smaller, quieter, more personal. Here, the formal distance of the Vyaspectha dissolves. One sits closer. The conversation flows freely. There is room for reading his more intimate expressions, for understanding his silences and his laughter. This is what Yagnopnishada seeks to gather.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eIt does not claim to capture the totality of the saint. No book can. What it offers is a handful of moments that give us a glimpse of the man behind the Katha of a Guru who is not human, though he behaves like an ordinary human; of the tapasvi who still laughs like a child; of the witness who walks gently through the world, carrying a fire within.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThe beauty of the evening gatherings is that we sit with what is his most intimate companion, his yagna kund-the sacred fire. And all that is spoken and left unspoken is absorbed as much and more by the flames of the fire he chooses to sit by five times a day.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eEvery generation has its saints, but not every generation is given the grace to watch one in close proximity; to see the man when he is not on the stage, when he is not addressing the world, but simply being. Sitting. Listening. Responding Remembering.\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eThis book is a tribute to that grace. And the agni of his presence, which continues to illumine us all.\u003c\/p\u003e","brand":"Morari Bapu","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186653888627,"sku":null,"price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/yagnopishadFront_1.jpg?v=1752216161"},{"product_id":"yatra-ek-adrishya-urja-ke-sang-12-jyotirling","title":"Yatra: Ek Adrishya Urja ke Sang – 12 Jyotirling","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eપૂજ્યા મોરેરી બાપુએ 1008 સમર્પિત શ્રોતાઓના ફૂલો, 'યલા, અદ્રશ્ય energy ર્જા સાથે!' સાથે અભૂતપૂર્વ આધ્યાત્મિક અભિયાન શરૂ કર્યું! આ historical તિહાસિક યાત્રાને સમર્પિત કરે છે જે ભગવાન શિવને સમર્પિત ભગવાન શિવને સમર્પિત શ્રેષ્ઠ મંદિરોના પવિત્ર માર્ગને આવરી લે છે. ઇતિહાસના પ્રથમ નવમા અંતની જેમ, બે ટ્રેનો આ યલામાં સમાંતર દોડી ગઈ અને 18 દિવસમાં 12,000 કિ.મી.ની ટિપ્પણી કરી. આ યાલા બરફીલા હિમાલયની height ંચાઈથી લીલી ખીણો સુધી, વિશાળ મેદાનોથી માંડીને વિસ્તૃત સમુદ્ર સુધીનો એક ખાસ અને દુર્લભ અનુભવ હતો. ભગવાન શિવના મૂર્ત પ્રતીક તરીકે, જ્યોટર્લિંગ, ભક્તો માટે ખૂબ જ ગૌરવપૂર્ણ છે, દરેક જ્યોટર્લિંગમાં હિન્દુ પૌરાણિક કથા અને અનન્ય વાર્તાઓ છે. યાલા કેદનાથના બરફીલા હિમાલય ખેલથી શરૂ થયો, જ્યાં યલી હવાના માર્ગ, ઘોડા અથવા પગ પર પહોંચી. ત્યાંથી ish ષિકેશ પહોંચ્યા, જે બેઝ સ્ટેશન હતું, જ્યાંથી યલાનો રેલ્વે તબક્કો શરૂ થયો દરેક જ્યોતર્લિંગ, મોરેરી બાપુ અને મંદિરો પર, મહાદેવના દૈવી સ્વરૂપની સાક્ષી અને રામકથાના આધ્યાત્મિક સંવાદમાં રહ્યા. રામચારિતમાનાસના જ્ with ાન સાથે, બાપુએ દરેક સચિવ સાઇટથી સંબંધિત વાર્તાઓ, પબ્લિસિસ્ટ્સ અને દંતકથાઓનું સંકલન કર્યું. 18 દિવસ સુધી, બાપુ અને ઓટા ટ્રેનમાં રહ્યા. ડ્વાડાશ જ્યોતર્લિંગની સાથે, જગન્નાથ પુરી પણ તિરુપતિ અને દ્વારકા જેવા તીર્થ કેન્દ્રો પર રોકાયો હતો. આ યલા સોમનાથ (ગુજરાત) માં પૂર્ણ થયું હતું, જે આ યલા માર્ગનો છેલ્લો જ્યોટર્લિંગ હતો. આ પછી, યાલા મોરરી બાપુના પૂર્વજોના ગામ અને જન્મસ્થળ, તાલગાજરાડા પહોંચ્યા.\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Morari Bapu","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186657493107,"sku":null,"price":1999.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/GujratiFrontFinal.jpg?v=1752216294"},{"product_id":"yatra-ek-adrishya-urja-ke-sang-12-jyotirling-1","title":"Yatra: Ek Adrishya Urja ke Sang – 12 Jyotirling","description":"\u003cp\u003eपूज्य मोरारी बापू ने 1008 समर्पित श्रोताओं फ्लावर्स के साथ एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक अभियान शुरू किया, 'याला, एक अदृश्य ऊर्जा के संग!' यह नम्र, अनूठा और उल्लेखनीय याता-वर्णन भगवान शिव को समर्पित श्रेष्ठ मंदिरों, बारह ज्योतिर्लिंगों के पावन पथ को समेटने वाली ऐतिहासिक यात्रा का निरूपण करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइतिहास के प्रथम नवतरीय प्रयास के समान इस याला में दो ट्रेनें समानांतर दौड़ीं और 18 दिनों में 12,000 किलोमीटर की उल्लेखनीय दूरी तय की। बर्फीले हिमालय की ऊँचाइयों से हरी-भरी घाटियों तक, विशाल मैदानों से विस्तृत सागरतट तक, यह याला एक विशेष और दुर्लभ अनुभव थी। भगवान शिव के मूर्त प्रतीक स्वरूप ज्योतिर्लिंग भक्तों के लिए अत्यंत महिमामय हैं, प्रत्येक ज्योतिर्लिंग से हिंदू पौराणिक पालों और अनूठी कथाएँ जुड़ी है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयाला केदारनाथ के हिमाच्छादित हिमालय क्षेल से शुरू हुई, जहाँ याली हवाई मार्ग, घोड़े, या पैदल पहुँचे। वहाँ से ऋषिकेश पहुँचे, जो बेस स्टेशन था, जहाँ से याला का रेलवे चरण शुरू हुआ\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रत्येक ज्योतिर्लिंग पर, मोरारी बापू और यानी मंदिरों के दर्शन करते, महादेव के दिव्य स्वरूप के साक्षी बनते और रामकथा के आध्यात्मिक संवाद में लिन रहते। रामचरितमानस के ज्ञान के साथ बापू ने प्रत्येक पवित्त स्थल से संबंधित कथाओं, लोकवायिकाओं, और दंतकथाओं का सरल और सुंदर समन्वय किया।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e18 दिनों तक, बापू और ओता ट्रेन में रहे। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के साथ-साथ जगन्नाथ पुरी, तिरुपति, और द्वारका जैसे पवित्त तीर्थस्थलों पर भी रुके। यह याला सोमनाथ (गुजरात) में सम्पन्न हुई, जो इस याला मार्ग का अंतिम ज्योतिर्लिंग था। इसके बाद याला मोरारी बापू के पैतृक गाँव गाँव और जन्मस्थल, तलगाजरदा के विराम स्थल तक पहुँची।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयह पुस्तक याला के भावनात्मक के सौंदर्य को अभिव्यक्त करने, प्रत्येक प • प्रत्येक पड़ाव पर गाई गई कथा के सार को संग्रहित करने, और मंदिरों से जुड़े इतिहास, स्थापत्य, और दंतकथाओं से परिचय कराने का एक विनश्न प्रयास है। यहाँ पहली बार मोरारी बापू के दैनिक नित्यकर्म का विवरण प्रकट हुआ है, जिसमें कुछ अज्ञात, पविक्त, और भावुक क्षण भी संरक्षित हैं।\u003c\/p\u003e","brand":"Morari Bapu","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186670665843,"sku":null,"price":1999.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/HindiFrontFinal.jpg?v=1752216493"},{"product_id":"gitanjali","title":"Gitanjali","description":"\u003cdiv data-expanded=\"true\" class=\"a-expander-content a-expander-partial-collapse-content a-expander-content-expanded\"\u003e\u003cspan\u003eभारतीय साहित्य और संस्कृति के आकाश में रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक ऐसे ध्रुवतारा हैं, जिनकी आभा समय और सीमाओं से परे है। 7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको नामक स्थान पर जन्मे ठाकुर एक समृद्ध, शिक्षित और सांस्कृतिक रूप से प्रबुद्ध परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर न केवल ब्रह्म समाज के अग्रणी नेता थे, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के कट्टर विरोधी भी थे। इसी वैचारिक वातावरण में पले रवीन्द्रनाथ की संवेदना, विचार और अभिव्यक्ति की शक्ति ने प्रारंभ से ही एक स्वतंत्र और व्यापक दृष्टिकोण को जन्म दिया। वे केवल एक कवि नहीं थे-वे दार्शनिक, संगीतकार, चित्रकार, समाज-सुधारक और शिक्षा-दर्शन के प्रणेता भी थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का वैश्विक स्वरूप तब सामने आया जब उन्होंने अपनी कविताओं का अंग्रेजी में स्वयं अनुवाद किया और गीतांजलि नामक पुस्तक के रूप में उन्हें प्रस्तुत किया। यह केवल शब्दों का अनुवाद नहीं था-यह भारतीय आत्मा का पश्चिमी चेतना से संवाद था। गीतांजलि की गूढ़ आध्यात्मिकता, सूक्ष्म सौंदर्यबोध और ब्रह्मांडीय प्रेम ने समूचे विश्व को प्रभावित किया। वर्ष 1913 में जब उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला, तो वे न केवल भारत के लिए, बल्कि समूचे एशिया के लिए भी यह सम्मान प्राप्त करने वाले पहले साहित्यकार बने। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'सर' की उपाधि से नवाज़ा, लेकिन गुरुदेव की आत्मा सत्ता से अधिक सत्य को महत्त्व देती थी-जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी। यह घटना उनकी नैतिक निष्ठा और रचनात्मक प्रतिरोध का अप्रतिम उदाहरण बन गई। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का रचना-संसार अद्वितीय है-उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, गीत, निबंध और चित्रकला में समान गति से साधना की। उनकी भाषा में जहाँ एक ओर भारतीय दर्शन की गहराई है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक चेतना का उजास भी। उन्होंने केवल भारत को ही नहीं, समूची मानवता को आत्मा की शांति, प्रकृति के साथ एकत्व और करुणा की शक्ति का पाठ पढ़ाया। 7 अगस्त, 1941 को जब उन्होंने देह त्यागा, तब तक वे 'गुरुदेव', 'विश्वकवि', और 'राष्ट्रगायक' जैसे नामों से विभूषित हो चुके थे। लेकिन इन उपाधियों से परे, वे एक ऐसे सर्जक थे, जिनकी कविताओं की ध्वनि आज भी विश्व के कोने-कोने में गूंजती है-आत्मा की भाषा बनकर।\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv class=\"a-expander-header a-expander-partial-collapse-header\"\u003e\u003ca role=\"button\" data-action=\"a-expander-toggle\" class=\"a-declarative\" data-a-expander-toggle='{\"allowLinkDefault\":true, \"expand_prompt\":\"Read more\", \"collapse_prompt\":\"Read less\"}'\u003e\u003ci class=\"a-icon a-icon-extender-collapse\"\u003e\u003c\/i\u003e\u003c\/a\u003e\u003c\/div\u003e","brand":"Ravindranath Tagore","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186680299635,"sku":null,"price":250.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/GeetanjaliFront.jpg?v=1752216658"},{"product_id":"gora","title":"Gora","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e'गोरा' रवीन्द्रनाथ टैगोर का केवल एक उपन्यास नहीं है-यह भारतीय समाज, पहचान, धर्म, और व्यक्ति के भीतर चलने वाले वैचारिक द्वंद्व का अद्भुत साहित्यिक रूपांतरण है। यह उपन्यास बंगाल नवजागरण, ब्रह्म समाज, पारंपरिक हिंदू सोच और अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद के टकराव की पृष्ठभूमि में लिखा गया था, पर इसकी चेतना पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए समान रूप से सार्थक है। टैगोर ने इस रचना के माध्यम से दिखाया कि धर्म और राष्ट्रवाद से भी ऊपर मानवता और आत्मा की स्वतंत्रता होती है। 'गोरा' नामक पात्र इस उपन्यास का केन्द्रीय स्तम्भ है-एक ऐसा युवा जो अपनी हिंदू पहचान पर गर्व करता है, राष्ट्रभक्ति में डूबा हुआ है और भारत की स्वतंत्रता को धर्म के पुनर्जागरण से जोड़कर देखता है। लेकिन जब उसे यह ज्ञात होता है कि वह वास्तव में हिंदू नहीं है, तब उसके विश्वास की नींव हिल जाती है। यहीं से उपन्यास उस गहरे प्रश्न को उठाता है: क्या हमारी पहचान जन्म और जाति से तय होती है या विचार, संवेदना और कर्तव्य से? रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'गोरा' के माध्यम से यह दर्शाया कि एक व्यक्ति की विचारधारा अगर पूर्वग्रहों पर टिकी हो, तो वह आत्म-ज्ञान की यात्रा में बाधा बनती है। गोरा का परिवर्तन-एक कट्टरपंथी से एक सहिष्णु, समावेशी और मानवीय दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति में-उपन्यास का सबसे शक्तिशाली पहलू है। यह परिवर्तन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस कालखंड के पूरे समाज का रूपांतरण है। टैगोर हमें बताते हैं कि भारत की सच्ची आत्मा किसी एक संप्रदाय में सीमित नहीं हो सकती; वह तो सबको समाहित करने वाली चेतना है। उपन्यास की महिला पात्र-सुचरिता, ललिता, और अनंदमयी-टैगोर की प्रगतिशील सोच को दर्शाती हैं। ये महिलाएं केवल प्रेम की प्रतीक्षा करने वाली पारंपरिक नायिकाएं नहीं हैं, बल्कि वैचारिक स्वतंत्रता, सामाजिक चेतना और आत्मसम्मान की प्रतीक बनकर सामने आती हैं। टैगोर के लिए नारी कोई दया की पात्र नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन की सक्रिय सहभागी है। 'गोरा' की भाषा गम्भीर, साहित्यिक और दर्शनीय है-हर संवाद के पीछे एक दर्शन है, और हर स्थिति के पीछे एक गहरा सामाजिक संकेत। टैगोर का लेखन न केवल भावनाओं को छूता है, बल्कि मन और मस्तिष्क को भी सक्रिय करता है। उनका यह उपन्यास भारत की आत्मा, उसकी बहुलता, विविधता और उसके भीतर छुपी एकता को उकेरने का अद्वितीय प्रयास है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Ravindranath Tagore","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186684756083,"sku":null,"price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/GoraFront.jpg?v=1752216813"},{"product_id":"apala","title":"Apala","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eवैदिक ऋचाओं के सृजन में जिन मातृमेधाओं ने अपना योगदान दिया है उनमें अपाला एक अप्रतिम चरित्र है। गार्गी, मैत्रेयी घोषा, कात्यायनी और लोपामुद्रा तथा अपाला ऐसी ऋषि कन्या ऋषि पत्नियाँ हैं, जिन्होंने अपनी मति से भारतीय संस्कृति को नवीन दिशा प्रदान की है। ऋग्वेद के अष्टम् मंडल के 91 सूक्त में एक से सात तक की रचनाओं की सृजन करती हैं। अपाला एक ऐसा ही उज्ज्वल चरित्र है जो कि अपाला के वृतांत के साथ इंद्र की कथा अनुस्यूत है। इसलिए इसे एक मिथक को चरित्र मान लेने में मुझे कोई हिचक नहीं है। अपाला ऋषि अत्रि और ऋषि-पत्नी अनुसुइया की पुत्री हैं। वह देवहूति और कदर्म की नतिनी हैं। सोम, दुर्वासा और दत्तात्रेय जैसे ऋषिगण उनके सगे भाई हैं, स्वयं पिता अत्रि सप्त ऋषियों में अग्रणी हैं। इस तरह की विशिष्ट अक्षय का और वैचारिक परिवेश में पली और बढ़ी अपाला भारतीय संस्कृति की एक अनूठी कृति है। जिसने भारतीय सामाजिक जीवन को बहुत दूर तक प्रभावित किया है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Dr. Nirupama Srivastava","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186688393331,"sku":null,"price":260.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/ApalaCoverFront.jpg?v=1752216952"},{"product_id":"jatak-kathayen","title":"Jatak Kathayen","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eभारत की कहानी कहने की परंपरा जितनी पुरानी है, उतनी ही प्रभावशाली भी। और इस परंपरा में जातक कथाएँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय हैं। ये कथाएँ सिर्फ़ कहानियाँ नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी संचित वह बौद्धिक और नैतिक संपदा हैं जिन्होंने बच्चों से लेकर बड़ों तक को जीवन के कठिनतम प्रश्नों के सरल उत्तर दिए हैं। जिस तरह पंचतंत्र ने व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और सामाजिक कौशल सिखाया, उसी तरह जातक कथाएँ ने हमें बताया कि कैसे करुणा, दया, और सत्य का मार्ग अपनाकर कोई भी व्यक्ति आत्मज्ञान की ओर बढ़ सकता है। जातक कथाएँ मूलतः भगवान बुद्ध के पूर्वजन्मों की जीवन गाथाएँ हैं, जिनमें वे कभी राजा बने, कभी ब्राह्मण, कभी हाथी, हिरण या कोई पक्षी। हर जन्म में उन्होंने किसी न किसी नैतिक मूल्यों की परीक्षा दी और मानवता के आदर्शों को निभाया। इन कहानियों का लक्ष्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि वे हमें यह सिखाने आती हैं कि जीवन का हर अनुभव-चाहे सुख हो या दुःख, विजय हो या पराजय-आध्यात्मिक उन्नति का अवसर बन सकता है। इन कथाओं की विशेषता यह है कि इनमें कथानक अत्यंत सहज और रोचक होता है, पात्र छोटे बच्चों की कल्पनाओं से लेकर प्रौढ़ों के विवेक तक को प्रेरित करते हैं, और अंत में जो शिक्षा मिलती है, वह कहीं गहरे तक बैठ जाती है। उदाहरण के लिए, एक कथा में बुद्ध एक शेर के रूप में जन्म लेते हैं, जो जंगल में न्यायप्रिय राजा होता है। वह अपने साथी जानवरों को बताता है कि डर के मारे झूठ बोलना या छल करना जीवित रहने का उपाय नहीं, बल्कि आत्मा के पतन का रास्ता है। इस तरह हर कथा में आत्मविकास और आत्म-साक्षात्कार का बीज मौजूद होता है। इन कहानियों को पढ़ते हुए पाठक यह महसूस करता है कि धर्म कोई रूढ़िगत या सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा जीवंत अनुभव है जो जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में भी प्रकट होता है। बुद्ध की शिक्षा 'अप्प दीपो भव'-\"स्वयं अपना दीपक बनो\"-इन कथाओं में हर मोड़ पर झलकती है। चाहे वह किसी असहाय की मदद हो, लोभ के विरुद्ध खड़ा होना हो, या फिर अहंकार का त्याग-हर कहानी मनुष्य को भीतर से झकझोरती है। जहाँ पंचतंत्र की कथाएँ व्यवहारिक चातुर्य और सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित हैं, वहीं जातक कथाएँ आंतरिक शुद्धता, नैतिक दृढ़ता और करुणा के बल पर जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देती हैं। यह अंतर दोनों ग्रंथों की आत्मा को अलग पहचान देता है। जातक कथाएँ केवल धर्मशास्त्र की विद्वत्ता का उदाहरण नहीं हैं, बल्कि ये जीवन की उस सरल और सच्ची समझ का दस्तावेज़ हैं जिसे कोई बच्चा भी समझ सकता है और कोई ऋषि भी मान सकता है। आज जब दुनिया तेज़ी से भौतिकवाद की दौड़ में उलझी हुई है, तब इन कथाओं का महत्व और भी बढ़ जाता है। ये हमें यह याद दिलाती हैं कि वास्तविक सुख, आत्म-संतोष और शांति बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और प्रेम से मिलते हैं। यही कारण है कि आज भी जातक कथाएँ न सिर्फ़ बौद्ध परंपरा में, बल्कि भारतीय जनमानस में नैतिक शिक्षा और आध्यात्मिक जागृति का एक ज़िंदा स्रोत बनी हुई हैं। यह पुस्तक उसी परंपरा का विस्तार है-एक प्रयास कि इन अद्भुत कथाओं की आत्मा आज की पीढ़ी तक पहुंचे, एक ऐसी भाषा और शैली में जो उन्हें न सिर्फ़ समझ आये, बल्कि भीतर तक उतर जाये। जैसे बुद्ध ने सैकड़ों वर्ष पूर्व अपने अनुभवों को कथाओं के रूप में साझा किया, वैसे ही आज हमें भी यह प्रयास करना है कि हम इस अनमोल विरासत को खोने न दें-बल्कि इसे पुनः जीवंत करें, पुनः प्रासंगिक बनाएँ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Raman Kumar Singh","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186690523251,"sku":null,"price":260.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/JatakKathayenFront.jpg?v=1752217154"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-6","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e'आलोचना के नये क्षितिज' कौटिल्य बुक्स की महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला है जिसमें वर्तमान आलोचना में सार्थक हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ आलोचकों के कृतित्व का प्रतिनिधि लेखन है। किसी भी समय के साहित्य के लिए आलोचना की उपस्थिति सबसे आवश्यक है जो न केवल साहित्य के मूल्य निर्णय की जिम्मेदारी लेती है बल्कि अपने समय के साहित्यिकों के प्रदाय का स्थान भी निर्धारित करती है। पाठकों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए यह श्रृंखला उपयोगी सिद्ध होगी। सुपरिचित आलोचक और बनास जन के सम्पादक पल्लव ने इस श्रृंखला का सम्पादन किया है जो पूर्व में भी कौटिल्य बुक्स की एक गौरवमयी पुस्तक श्रृंखला 'मैं और मेरी कहानियाँ' का सम्पादन कर चुके हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू महाविद्यालय में सह आचार्य डॉ पल्लव अपनी साहित्यिक सक्रियता और गहन अंतर्दृष्टि के कारण समादृत हुए हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Vaibhav Singh","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43186699698291,"sku":null,"price":399.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0024\/0916\/9011\/files\/v2.jpg?v=1752217379"},{"product_id":"aalochna-ke-naye-kshitij-7","title":"Aalochna ke Naye Kshitij","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e'आलोचना के नये क्षितिज' कौटिल्य बुक्स की महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला है जिसमें वर्तमान आलोचना में सार्थक हस्तक्षेप करने वाले वरिष्ठ आलोचकों के कृतित्व 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