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Pados Ka Samay
Description:
'पड़ोस का समय 'शीर्षक इस संकलन में तीन खण्ड हैं. पहले खण्ड में साहित्य, कला और संस्कृति विषयक मुद्दों पर रोशनी डाली गई है. दूसरा खण्ड मीडिया पर और तीसरा खण्ड शिक्षा पर केंद्रित है. डॉ. अग्रवाल क्योंकि लम्बे समय से एक अध्येता और शिक्षक के रूप में साहित्य कर्म से जुड़े हैं और नियमित रूप से लिखते और प्रकाशित भी होते रहे हैं, साहित्य, कला और संस्कृति में उनकी रुचि और इनकी बारीकियों के बारे में उनकी समझ असंदिग्ध है. इस खण्ड के लेखों में वे इस दुनिया के अंतरंग से हमारा साक्षात्कार कराते हैं और यहाँ हो रही किसम-किसम की हलचलों का हवाला देते हुए उनके नेपथ्य तक हमें ले जाते हैं और यह भी बताते हैं कि उन तमाम हलचलों से हम और ये विधाएँ किस तरह प्रभावित हो रही हैं. यहाँ डॉ. अग्रवाल केवल अंधेरे-उजाले की बात करके ही नहीं थम जाते हैं, वे भविष्य और बेहतरी के लिए सुझाव भी देते हैं. इसी तरह मीडिया वाले खण्ड में वे बहुत तेजी से बदले और विकृत हुए मीडिया परिदृश्य की बहुत सारी अनदेखी-अनजानी परतों को उधेड़ते हैं और इन पर तीखी टिप्पणियाँ करके इसके दुष्प्रभावों से हमें आगाह करते हैं. किताब का तीसरा खण्ड शिक्षा से संबद्ध है. डॉ. अग्रवाल लगभग साढ़े तीन दशक राजस्थान की उच्च शिक्षा सेवा से संबद्ध रहे हैं और एक शिक्षक और शैक्षिक प्रशासक की अपनी विभिन्न भूमिकाओं में उन्होंने इस तंत्र को भीतर से देखा है. अपने इसी देखे के आधार पर और इस कर्म के प्रति अपने बहुत गहरे लगाव के कारण इन लेखों में वे देश और खासतौर पर राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर अपनी व्यथा हमसे साझा करते हुए इसकी बेहतरी के लिए सुझाव देते हैं.डॉ. अग्रवाल की पृष्ठभूमि साहित्य की है इसलिए स्वभावतः इन लेखों में उनका साहित्यानुराग और संस्कार स्पष्ट चीन्हे जा सकते हैं. यहाँ विषय भले ही चाहे जो हो, ये लेख किसी साहित्यक रचना का-सा स्वाद देते हैं. डॉ. अग्रवाल की भाषा का प्रवाह पाठक को अपने साथ बहा ले जाता है. डॉ. अग्रवाल के इन लेखों में एक बात और ध्यान देने योग्य है. वे किसी की आलोचना करते हुए भी कटु नहीं होते हैं और जिससे वे असहमत होते हैं उसके प्रति भी कोई अवमानना उनके यहाँ ढूंढे से भी नहीं मिलेगी. आज के कड़वाहट भरे समय में यह बात खास तौर पर सराहनीय है.
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