Suraj Jahan Doobta Hai
Lokbabu
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जिन्दगी के नामुराद थपेड़ों और उसके भाग्य ने विनय को ऐसी जगह ला फेंका था, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। उम्मीद तो उसे कोरोना महामारी से अपने बचने की भी नहीं थी, मगर वह बच गया था। और जिसे बचाने की उम्मीद से वह उसे अपने पास ले आया था, खो बैठा था। बाढ़ आने पर बहुत कुछ डूब जाता है, छीन जाता है, मगर बाढ़ पीछे कुछ उपजाऊ मिट्टी भी छोड़ जाती है। महामारी ने उसे कुछ लौटाया भी था। मगर जो खो जाता है कीमत उसकी होती है। उसकी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा अपने पहले प्यार के बिछोह और ऊहापोह भरी जिंदगी जीते हुए गुजरा था। उसका बिछड़ा प्यार अचानक मशरूम की तरह जमीन से फूट निकला था जो करीब आकर टूट गया था। वह दुखी था, निराश था, मगर कुछ नई जिम्मेदारियाँ ऊग आयी थीं।
वह छत्तीसगढ़ की बियाबान वन-स्थली में चला आया था। यहाँ आकर उसे बड़ी शान्ति का एहसास हुआ। जाने क्यों उसे अपने अवचेतन में कहीं ऐसा महसूस होता था कि खुदा न खास्ता कभी उसकी प्रिया दोबारा उसे मिलेगी तो वह जगह यही हो सकती है!... उसकी प्रिया इस दुनिया से बिदा हो चुकी है, ऐसी जानकारी उसे उन लोगों ने दी थी, जिन्होंने खुद अपनी आँखों के सामने उसे बिदा होते नहीं देखा था। उसके अवचेतन में उसके एक बार फिर मिल जाने का विश्वास समाया हुआ था। मगर वह दूसरों से अपने अंदर की यह बात न कह सकता था, न समझा सकता था। डर था, लोग उसकी हाँ में हाँ मिलाकर झूठी तसल्ली देने लगेंगे और मन ही मन उसके सठियाने, पगलाने की बात भी सोचेंगे!
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